जब आप मैच देखते हैं तो अक्सर खेल के पीछे एक व्यक्ति होता है जो सारी रणनीति बनाता है – वही मुख्य कोच. वह खिलाड़ी चुनता, प्रशिक्षण योजनाएँ बनाता और मैदान पर निर्णय लेने में मदद करता है. अगर टीम जीतती है तो कई बार उसका हाथ सराहना में मिलता है, लेकिन हार होने पर सवाल भी उसी से ही शुरू होते हैं.
कोच का काम सिर्फ फ़ील्ड में नहीं रहता. पहले वह खिलाड़ियों के फिटनेस रिपोर्ट देखता, उनकी तकनीक सुधरने के लिए व्यक्तिगत सत्र बनाता और टीम के लीडरशिप मीटिंग्स में भाग लेता है. मैच से पहले की रणनीति, पिच रिपोर्ट और विरोधी टीम की ताकत‑कमजोरियों का विश्लेषण भी उसकी ज़िम्मेदारी है.
प्रैक्टिस में कोच अक्सर गेंदबाज़ों को नई डिलीवरी सिखाता, बॅटरों को शॉट सिलेक्ट करने के टिप्स देता और फील्डिंग ड्रिल्स कराता. इन सबके बाद वह खेल‑खेल में खिलाड़ियों की मनोस्थिति पर भी नज़र रखता है क्योंकि मानसिक मजबूती जीत का बड़ा कारक है.
अभी कुछ महीने पहले बबर आज़म के अनुपस्थिति ने पूरे भारत‑पाकिस्तान मैच में सवाल खड़े कर दिए. कई रिपोर्टों में बताया गया कि कोच आकिब जावेद ने बबर की फिटनेस और टीम प्लानिंग पर चर्चा नहीं कर पाई, जिससे उनका चयन रद्द हो गया.
इस घटना से यह साफ़ हुआ कि मुख्य कोच का निर्णय सिर्फ तकनीकी नहीं बल्कि प्रबंधन भी है. अगर खिलाड़ी चोटिल या फ़ॉर्म में गिरा तो कोच को जल्दी समाधान निकालना पड़ता है, वरना टीम की जीत पर असर पड़ेगा.
दूसरी ओर, हाल ही में भारतीय टीम ने कुछ युवा खिलाड़ियों को टेस्ट श्रृंखला में शामिल किया है और उनका प्रदर्शन कोच के प्रशिक्षण तरीकों का परिणाम माना जा रहा है. इस तरह से आप देख सकते हैं कि सही कोचिंग से टीम में नई ऊर्जा आ सकती है.
अगर आप क्रिकेट प्रेमी हैं तो यह समझना ज़रूरी है कि मुख्य कोच केवल एक नाम नहीं, बल्कि पूरी टीम की दिशा तय करने वाला केंद्र बिंदु होता है. उनके फैसले सीधे तौर पर खेल के परिणामों में झलकते हैं और अक्सर वे ही खिलाड़ी‑ट्रांसफॉर्मेशन के पीछे होते हैं.
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गौतम गंभीर ने भारतीय क्रिकेट टीम के नए मुख्य कोच के रूप में व्यक्तिगत महत्व को टीम की सफलता से कमतर बताते हुए अपने कार्यकाल की शुरुआत की। उन्होंने अपनी प्राथमिकता में टीम की जीत को रखा और इस भूमिका में राहुल द्रविड़ के योगदान की सराहना की। श्रीलंका दौरे से पहले प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने यह स्पष्ट किया।
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