जब भी किम जोंग‑उन के बारे में बात होती है, लोग तुरंत न्यूक्लियर टेस्ट या मिसाइल रैंच का ज़िक्र करते हैं। लेकिन हाल के महीनों में उनके कदम थोड़ा बदल रहे हैं – आर्थिक सहयोग, खेल कार्यक्रम और सांस्कृतिक आदान‑प्रदान पर ध्यान बढ़ रहा है। इस बदलाव को समझना जरूरी है, खासकर जब भारत जैसे बड़े देश भी उत्तर कोरिया की नीतियों से प्रभावित हो सकते हैं।
पहले साल में किम ने कई बार कहा कि वह अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध हटाने के लिए बातचीत खोलने को तैयार है। इसके बाद दो बड़े सम्मेलन हुए जहाँ उन्होंने विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने की बात कही। साथ ही, उत्तर कोरिया ने अपने खेल कार्यक्रमों में दक्षिण कोरियाई खिलाड़ियों को आमंत्रित किया – इससे पता चलता है कि सांस्कृतिक द्वार भी खुल रहे हैं।
इन बदलावों का एक बड़ा कारण आर्थिक दबाव है। कंज़्यूमर सामान और टेक्नोलॉजी पर प्रतिबंध के चलते देश की अर्थव्यवस्था गिर रही थी, इसलिए किम ने वैकल्पिक रास्ते खोजने शुरू किए। उन्होंने चीन के साथ ट्रेड समझौते को दोबारा जाँचने का इरादा जताया, लेकिन यह स्पष्ट नहीं हुआ कि वह किस दिशा में जाएगा।
भले ही भारत और उत्तर कोरिया के बीच सीधा व्यापार सीमित है, लेकिन किम जोंग‑उन की नई नीति भारत के लिए कुछ अवसर भी ला सकती है। उदाहरण के तौर पर, अगर उत्तर कोरिया प्रतिबंध हटाकर अपना कृषि उत्पादन बढ़ाए, तो खाद्य निर्यात में सहयोग हो सकता है। दूसरी ओर, यदि वह मिसाइल तकनीक को और विकसित करे, तो सुरक्षा चुनौती भी बढ़ेगी – खासकर पूर्वी सीमा से जुड़े देशों के लिए।
वर्तमान में भारत ने उत्तर कोरिया को ‘सुरक्षा खतरा’ कह कर कड़ी निगरानी रखी है, परंतु अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर दोनों देशों की भागीदारी कभी‑कभी मिलती रहती है। अगर किम जोंग‑उन आर्थिक सुधार की दिशा में लगातार कदम उठाते हैं, तो भारत के साथ सांस्कृतिक आदान‑प्रदान या शैक्षिक कार्यक्रम शुरू हो सकते हैं – जिससे युवा वर्ग को नई जानकारी मिलने का मौका मिलेगा।
एक और बात ध्यान देने योग्य है कि किम ने हाल ही में अपने देश की डिजिटल बुनियादी ढाँचा मजबूत करने की योजना घोषित की है। यदि वह इस दिशा में आगे बढ़े, तो भारत के टेक कंपनियों के लिए साझेदारी के अवसर बन सकते हैं, जैसे सॉफ़्टवेयर विकास या साइबर सुरक्षा सहयोग। यह दोनों देशों को आर्थिक रूप से जोड़ने का एक नया रास्ता हो सकता है।
समय‑सही बात यह भी है कि किम जोंग‑उन की नीति कभी‑कभी अचानक बदल सकती है। इसलिए, भारत के नीति‑निर्माताओं को लगातार अपडेट रहना चाहिए और संभावित जोखिम तथा अवसर दोनों को तौल कर निर्णय लेना चाहिए।
संक्षेप में कहा जाए तो किम जोंग‑उन का नया दृष्टिकोण आर्थिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में खुलापन दिखा रहा है, जबकि सुरक्षा के मुद्दे अभी भी प्रमुख बने हुए हैं। भारत को इस बदलाव को समझते हुए अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करनी होगी, साथ ही संभावित सहयोगी क्षेत्रों पर नजर रखनी चाहिए। ऐसा संतुलन बनाए रखने से दोनों देशों के बीच भविष्य में सकारात्मक संवाद स्थापित हो सकता है।
विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर ने एक कार्यक्रम में पूछा गया कि यदि उन्हें उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग-उन या दानकर्ता जॉर्ज सोरोस के साथ डिनर करना हो, तो वे किसे चुनेंगे। जयशंकर ने चतुराई से उत्तर दिया व्यक्त करते हुए कहा, "मैं नवरात्रि का उपवास कर रहा हूँ," जिससे उन्होंने इस विवादास्पद प्रश्न से बचने की कुशलता दिखाई।
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