हिन्दू कैलेंडर में हर महीने का अंठारहवाँ या उन्नीसवाँ दिन ‘एकादशी’ कहलाता है। इनमें से कुछ खास होते हैं – जैसे कि देव उठनी एकादशी. यह त्यौहार शनि देव की आराधना और उपवास से जुड़ा हुआ है, जो अक्सर महीने के चंद्र नवमी के बाद आता है। अगर आप इसे पहली बार सुन रहे हैं तो चिंता न करें; इस लेख में हम सारी जानकारी आसान भाषा में देंगे।
देव उठनी एकादशी का सही दिन जानने के लिए पंचांग देखना सबसे भरोसेमंद तरीका है। आम तौर पर यह शुक्ल पक्ष (चाँद का बढ़ता हुआ भाग) में आता है, लेकिन कभी‑कभी कृष्ण पक्ष में भी पड़ सकता है। 2025 में इसकी तिथि लगभग 16 मार्च के आसपास होगी; फिर भी स्थानीय पंचांग या मोबाइल ऐप से दोबारा चेक कर लेना बेहतर रहेगा। सुबह उगते ही सूर्य का पहला प्रकाश ‘उठनी’ माना जाता है, इसलिए उपवास और पूजा का प्रारम्भ उसी समय से होना चाहिए।
1. सादा उपवास: इस दिन नॉन‑वीजेनिक लोग केवल फल, फालू (काजू, बादाम) और शुद्ध पानी ले सकते हैं। मीट, अंडा, दूध वाले उत्पाद पूरी तरह से बंद रखें। 2. भोजन का समय: सूर्योदय से पहले हल्का स्नैक लिया जा सकता है, पर मुख्य भोजन केवल चंद्र उदय के बाद ही होना चाहिए। यह ‘उठनी’ का सिद्धान्त है – सूर्य के साथ अपना दिन शुरू करें। 3. पूजा की विधि: शनि देव को धूप, अक्षत और कलश से सजाकर अर्पित करना चाहिए। यदि घर में शनि मन्दिर नहीं है तो छोटा सा पवित्र स्थान बना कर उसमें शनि के चित्र या मूर्ति रखें। 4. कीर्तन व पाठ: शाम के समय ‘शनि चालीसा’ और ‘ब्रह्मा विष्णु महेश्वर स्तोत्र’ का पाठ करने से ऊर्जा बढ़ती है। 5. सकारात्मक सोच: इस दिन तनाव या गुस्सा नहीं रखना चाहिए; शांति एवं धैर्य की भावना रखें, क्योंकि यही शनि देव के प्रसाद को आकर्षित करता है।
इन नियमों का पालन करने से न केवल आध्यात्मिक लाभ मिलता है, बल्कि शरीर भी हल्का रहता है और मन शांत रहता है। कई लोग बताते हैं कि इस एकादशी के बाद उन्हें काम में फोकस बढ़ा हुआ महसूस होता है।
कहानी यह है कि प्राचीन समय में शनि देव ने पृथ्वी पर अति कठोर अनुशासन लागू किया था, जिससे कई लोग कष्ट झेल रहे थे। फिर एक साधु ने उन्हें ‘उठनी’ (सुबह की पहली रोशनी) के महत्व को समझाया और कहा – “जब तक सूरज नहीं उगता, तब तक सब कुछ स्थिर रहता है; इसलिए सुबह उठकर पूजा करो तो ही सभी बाधाएँ दूर होंगी।” शनि देव ने इस बात को स्वीकार किया और उनका आशीर्वाद मिला। तब से हर साल इस दिन विशेष रूप से सूर्य के उदय के साथ उपवास शुरू करना शुभ माना जाता है।
इस कथा से हमें यह सीख मिलती है कि ‘उठनी’ का समय केवल शारीरिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक जागरूकता का भी संकेत है। जब हम सुबह की पहली रोशनी में अपने इरादे साफ़ रखते हैं, तो हमारी सभी इच्छाएँ स्पष्ट हो जाती हैं।
1. सफाई – घर को पूरी तरह से झाड़‑फूंक कर साफ करें। 2. अल्टर बनाएं – एक छोटी सी मेज़ पर शनि की मूर्ति या चित्र रखें, उसके सामने धूप, अक्षत (चावल) और कुमकुम रखें. 3. जल-आरती – पानी में कुछ पुदीने के पत्ते डालें, फिर उसे पूजा स्थल पर छिड़केँ। 4. मंत्रोच्चार – “ॐ शं शनैःश्चर्याय नम:” को 108 बार जपें या शनि चालीसा पढ़ें. 5. प्रसाद – अंत में फल, फालू और मिठाई (जौ के लड्डू) अर्पित करें।
इन सरल चरणों से आप बिना किसी महंगे सामान के ही प्रभावी पूजा कर सकते हैं।
उपवास तोड़ते समय हल्का और पचने में आसान भोजन चुनें – जैसे उबला आलू, दाल का सूप या किचड़ी। इससे पेट पर दबाव नहीं पड़ेगा और शरीर धीरे‑धीरे सामान्य स्थिति में आ जाएगा। साथ ही हरी सब्ज़ी और फल भी शामिल करें ताकि पोषक तत्व पूरी तरह मिल सकें।
आपको अब बस यह तय करना है कि इस साल देव उठनी एकादशी को आप कैसे मनाएँगे। याद रखें, सरलता में ही सच्चा आनंद छिपा होता है। शुभकामनाएं और शनि की कृपा हमेशा आपके साथ रहे!
देव उठनी एकादशी 2024 का पर्व 12 नवंबर को मनाया जाएगा, जब भगवान विष्णु अपने चार महीने के योग निद्रा से जागते हैं। इस दिन का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है क्योंकि यह शुभ और वैवाहिक गतिविधियों की शुरुआत का संकेत देता है। भक्त परंपरागत गीत गाकर भगवानों को जागरूक करते हैं और तुलसी-शालिग्राम का विवाह अगले दिन संपन्न होता है।
©2025 iipt.co.in. सर्वाधिकार सुरक्षित