जब राहुल गांधी ने 23 नवंबर, 2025 को एक हिंदी पोस्ट में लिखा कि "यह कोई अक्षमता नहीं, एक साजिश है," तो भारत के चुनाव प्रणाली के अंदर एक गहरा दरार उजागर हो गया। तीन हफ्ते में 16 बूथ स्तरीय अधिकारी (BLO) की मौत हो गई — कुछ दिल का दौरा, कुछ आत्महत्या, सबके पीछे एक ही कारण: अत्यधिक कार्यभार। चुनाव आयोग ऑफ इंडिया (ECI) की विशेष तीव्र समीक्षा (SIR) अभियान के तहत लाखों मतदाता विवरणों की नवीनीकरण की जा रही है, लेकिन इसकी कीमत किसने चुकाई? वो वो लोग जो घर-घर जाकर डेटा एकत्र करते हैं। बिना डिजिटल सिस्टम के, बिना कोई सहायता के, बस एक फाइल और एक कलम के साथ।
"कागजों का जंगल", न कि डिजिटल भारत
राहुल गांधी ने कहा कि भारत दुनिया के लिए उन्नत सॉफ्टवेयर बनाता है, लेकिन चुनाव आयोग अभी भी 22 साल पुरानी मतदाता सूचियों के हजारों पन्नों को उलट रहा है। "क्या हम इतने पिछड़ गए हैं?" उन्होंने प्रश्न उठाया। उनका आरोप है कि SIR का उद्देश्य मतदाताओं को थका देना है — जिससे सच्चे मतदाता अपने अधिकारों के लिए लड़ना छोड़ दें, और फिर वो जो चाहते हैं, वो नाम जोड़ दें। उन्होंने इसे "मत चोरी" का ढंग बताया।
वास्तव में, जब एक मतदाता को एक नया नाम जोड़ने के लिए अपनी पुरानी सूची के 200 पन्ने खोजने पड़ते हैं, तो वह बस हाथ उठा देता है। और वहीं, किसी और का नाम बिना किसी प्रमाण के जोड़ दिया जाता है। राहुल ने यह भी कहा कि अगर ECI सच में पारदर्शिता चाहता है, तो यह सूची ऑनलाइन, सर्चेबल, और मशीन-रीडेबल होनी चाहिए — न कि एक तिल भर भी नहीं बदली 22 साल की फाइलों के ढेर के रूप में।
राज्यों की प्रतिक्रिया: ममता और खरगे ने भी उठाई आवाज
केंद्रीय आयोग के खिलाफ आवाज़ें अब सिर्फ कांग्रेस तक सीमित नहीं हैं। ममता बनर्जी, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री, ने तुरंत SIR को रोकने की मांग की। उन्होंने कहा, "यह अभियान न केवल जनता को थका रहा है, बल्कि अधिकारियों को मार रहा है।"
उसी दिन, मल्लिकार्जुन खरगे, कांग्रेस अध्यक्ष, ने SIR की तुलना डेमोनेटाइजेशन और कोविड-19 लॉकडाउन से की। "जब आप लोगों को अचानक अपनी जिंदगी के आधार को बदलने को कहते हैं, तो यह एक आर्थिक और सामाजिक आपदा हो जाती है," उन्होंने कहा। उनका संदेश साफ था — इस तरह के अनियोजित, अत्यधिक त्वरित अभियान लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाते हैं।
महादेवपुरा का रहस्य: एक नाम का दावा, एक आरोप का दायरा
यह सब एक विशेष घटना के बाद तेज हुआ — बैंगलोर के महादेवपुरा विधानसभा क्षेत्र में लाखों नामों का अवैध जोड़ा जाना। नवंबर 2025 में, कांग्रेस कर्मचारी विनोदा ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। उनका दावा है कि एक ऐसा नेक्सस था — अधिकारियों, एक राजनीतिक दल और निजी व्यक्तियों के बीच — जिसने फर्जी मतदाताओं को जोड़ा।
इसके जवाब में, अरविंद लिम्बावल्ली, बीजेपी के इस क्षेत्र के लंबे समय के विधायक, ने कहा कि यह सब माइग्रेंट आबादी के कारण है। "2008 में 2.75 लाख वोटर थे, अब 6.80 लाख हैं। यह वृद्धि अवैध नहीं, जनसांख्यिकी है," उन्होंने कहा। लेकिन विनोदा का जवाब है: "अगर यह वृद्धि है, तो फिर नाम जोड़ने के लिए कोई वैध प्रमाण क्यों नहीं?"
कांग्रेस का आंतरिक उथल-पुथल: बिहार में सात नेताओं का निलंबन
इसी बीच, कांग्रेस के अंदर भी तूफान चल रहा है। 24 नवंबर, 2025 को, बिहार प्रांतीय कांग्रेस समिति (BPCC) ने सात नेताओं को छह साल के लिए प्राथमिक सदस्यता से निलंबित कर दिया। कारण? "विपक्षी गतिविधियां" और "अनुशासन का उल्लंघन" — जो बिहार विधानसभा चुनाव के बाद आया।
BPCC अध्यक्ष राजेश राम ने सभी जिला समितियों को निर्देश दिया कि वे बूथ-स्तरीय वोटिंग, कैंपेन रणनीति और गठबंधन विफलताओं का विश्लेषण करें। लेकिन विद्रोही नेता कह रहे हैं: "यह सिर्फ बलि का बकरा बनाने का तरीका है। राहुल और खरगे की गलतियां छिपाने के लिए।"
राहुल के विरुद्ध नया हमला: न्यायाधीश की शपथ के बिना अनुपस्थिति
24 नवंबर को, शेहजाद पूनावाला, बीजेपी के स्पीकर, ने राहुल को राष्ट्रपति भवन में न्यायाधीश सूर्य कांत की शपथ समारोह में अनुपस्थिति के लिए टारगेट किया। "क्या राहुल बाबा जंगल सफारी पर गए हैं, या विदेश घूमने?" उन्होंने ट्वीट किया। इसके जवाब में, 272 नामी नागरिकों ने राहुल को एक खुला पत्र भेजा — चुनावी निष्पक्षता के लिए एक आह्वान। लेकिन इसके बारे में जानकारी अभी अस्पष्ट है।
एक अलग घटना — हुबली में एक कॉन्वेंट स्कूल में RSS के संबंधित लोगों का घुसपैठ — जिसकी चर्चा 24 सितंबर, 2025 को एक ब्लॉग पर हुई, उसे भी इस तर्क के साथ जोड़ दिया गया। लेकिन इसका कोई सीधा संबंध नहीं है।
क्या अगला कदम?
अब चुनाव आयोग चुप है। कोई आधिकारिक बयान नहीं। कोई जांच का ऐलान नहीं। लेकिन लोग अब जाग रहे हैं। एक बूथ अधिकारी की मौत एक आंकड़ा नहीं, एक इंसान की मौत है। और जब लोग अपने नाम के लिए लड़ने के बजाय बैठ जाएं, तो लोकतंत्र भी बैठ जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
SIR क्या है और यह क्यों विवादित है?
SIR यानी विशेष तीव्र समीक्षा, चुनाव आयोग द्वारा जारी एक अभियान है जिसका उद्देश्य 22 साल पुरानी मतदाता सूचियों को नवीनीकृत करना है। इसमें बूथ स्तरीय अधिकारी घर-घर जाकर डेटा एकत्र करते हैं। विवाद इसलिए है कि इसे डिजिटल सिस्टम के बजाय कागजी तरीके से किया जा रहा है, जिससे BLOs को अत्यधिक दबाव में लाया गया है, और इसके नतीजे में 16 की मौत हो गई।
राहुल गांधी के आरोपों का क्या सच्चाई है?
राहुल गांधी का आरोप है कि SIR का वास्तविक उद्देश्य वास्तविक मतदाताओं को थका कर उन्हें वोटिंग से दूर रखना है, ताकि फर्जी नाम जोड़े जा सकें। उनके आरोपों का समर्थन महादेवपुरा में लाखों अवैध नामों के जोड़े जाने के आंकड़ों और BLOs की मौतों से होता है। हालांकि, बीजेपी इसे राजनीतिक आरोप बताती है।
BLOs की मौतों की जांच हुई है?
अभी तक कोई आधिकारिक जांच नहीं हुई है। चुनाव आयोग ने इन मौतों को "संयोग" बताया है, लेकिन डॉक्टरों और मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि इनमें शारीरिक और मानसिक थकान का स्पष्ट संबंध है। एक राष्ट्रीय स्वास्थ्य अध्ययन के अनुसार, बूथ अधिकारियों में अत्यधिक कार्य दबाव के कारण हृदय रोग का खतरा 3.2 गुना बढ़ जाता है।
क्या डिजिटल वोटर लिस्ट संभव है?
हां, और यह तकनीकी रूप से पहले से ही संभव है। भारत ने आधार और डिजिटल आयुष्मान भारत जैसे प्रणालियों के साथ दिखाया है कि विशाल डेटाबेस को सुरक्षित और विश्वसनीय बनाया जा सकता है। अगर यह आयुष्मान भारत के लिए संभव है, तो फिर वोटर लिस्ट के लिए क्यों नहीं? सवाल यह है कि क्या इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति है।
कांग्रेस के भीतर अंतर्विरोध क्यों बढ़ रहे हैं?
बिहार चुनाव के बाद कांग्रेस की हार ने नेतृत्व की जिम्मेदारी को सवाल में डाल दिया। जब राहुल और खरगे बाहर चुनावी आरोप लगाते हैं, तो नीचे के नेता अपने अधिकारों के लिए जिम्मेदार ठहराए जा रहे हैं। यह एक विस्थापन रणनीति है — जिसमें निचले स्तर के नेता बलि के बकरे बन रहे हैं, जबकि ऊपरी नेतृत्व बच रहा है।
इस विवाद का भविष्य क्या होगा?
अगर चुनाव आयोग ने अभी तक कोई जांच नहीं की, तो यह विवाद अगले चुनावों तक बना रहेगा। संभावित रूप से, इसका फैसला सुप्रीम कोर्ट या एक निर्वाचन अधिकार आंदोलन लेगा। लोग अब चुनाव के बारे में विश्वास खो रहे हैं — और जब विश्वास खत्म होता है, तो लोकतंत्र भी खत्म हो जाता है।
17 टिप्पणियाँ
Tanya Bhargav
ये सब बस एक बड़ा धोखा है। जब तक हम लोगों को डिजिटल सिस्टम की जगह कागज़ों के ढेर से लड़वाएंगे, तब तक ये मौतें रुकेंगी नहीं। कोई भी इंसान इतना दबाव नहीं सह सकता। ये लोग बस अपनी राजनीति के लिए इन लोगों को इस्तेमाल कर रहे हैं।
Sanket Sonar
SIR का असली मकसद वोटर लिस्ट का अपडेट नहीं बल्कि वोटिंग को अवरुद्ध करना है। ये जो बोल रहे हैं वो बस डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन के खिलाफ एक राजनीतिक बाधा है।
pravin s
क्या हमने कभी सोचा कि जिन लोगों को घर-घर जाकर डेटा एकत्र करना है, उनके पास बस एक फोन और एक फाइल है? अगर हम आधार के लिए डिजिटल सिस्टम बना सकते हैं तो वोटर लिस्ट के लिए क्यों नहीं? ये सिर्फ इच्छाशक्ति का सवाल है।
Bharat Mewada
लोकतंत्र वो नहीं जो चुनाव आयोग की फाइलों में छिपा हो। लोकतंत्र वो है जब एक बूथ अधिकारी अपने घर से निकले और वापस न आए। उसकी मौत का नाम आंकड़ा नहीं, इंसानी नुकसान है। हम इसे भूल रहे हैं।
Ambika Dhal
राहुल गांधी का ये सब बस एक राजनीतिक शोर है। जब वो स्वयं के अंदर बिहार में सात नेताओं को निलंबित कर रहे हैं, तो वो कैसे दूसरों को गलत कह सकते हैं? ये लोग बस अपनी गलतियों को ढकने के लिए बलि के बकरे बना रहे हैं।
Narinder K
अरे भाई, अगर ये सब इतना बुरा है तो फिर बीजेपी भी चुप क्यों है? ये तो दोनों पार्टियां इसे अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर रही हैं। जिसका नाम बड़ा है, उसकी बात सुन लो।
Narayana Murthy Dasara
दोस्तों, ये सिर्फ एक चुनावी अभियान नहीं, ये हमारे लोकतंत्र की जान है। जब तक हम एक आम आदमी की जिंदगी को बस एक डेटा पॉइंट नहीं समझेंगे, तब तक ये घटनाएं दोहराई जाएंगी। हमें डिजिटल बनना होगा, न कि कागज़ के जंगल में खो जाना।
lakshmi shyam
ये राहुल गांधी तो हमेशा बाहर आकर गुस्सा दिखाते हैं। अपने पार्टी के अंदर के बदलावों को देखो, सात नेताओं को निलंबित किया और फिर बाहर बड़ी बातें कर रहे हैं। ये सब नाटक है।
Sabir Malik
मैं एक बूथ अधिकारी के बेटे हूं। उसकी रोज़ की रात 11 बजे तक फोन पर बैठने की आदत है। वो बस एक फाइल और एक कलम से लाखों घरों का डेटा एकत्र करता है। उसकी आंखें लाल हो गई हैं, उसकी पीठ टेढ़ी हो गई है। और अब वो नहीं है। ये कोई आंकड़ा नहीं, ये मेरा पिता है। अगर आपको लगता है कि ये सिर्फ एक पोस्ट है, तो आप गलत हैं।
Debsmita Santra
हम जब डिजिटल इंडिया की बात करते हैं तो सिर्फ यूपीआई और डिजिटल पेमेंट्स की बात करते हैं लेकिन वोटर लिस्ट के लिए तो हम अभी भी कागज़ के ढेर उलट रहे हैं। ये बस एक राजनीतिक चुनाव नहीं ये एक टेक्नोलॉजी का अपमान है। हमें इसे एक नेशनल प्रायोरिटी बनाना चाहिए। एक आधार जैसा सिस्टम बनाना जो ऑनलाइन, रियल-टाइम, और सर्चेबल हो। ये संभव है बस हमारे पास इच्छाशक्ति नहीं है।
Vasudha Kamra
चुनाव आयोग को एक आधिकारिक बयान देना चाहिए। नहीं तो ये अफवाहें और राजनीतिक बयानबाजी बढ़ती रहेगी। ये बूथ अधिकारियों की मौतों का कारण जांचा जाना चाहिए। डॉक्टरों के अध्ययन के आधार पर ये तो स्पष्ट है कि अत्यधिक दबाव का नतीजा है।
Abhinav Rawat
हम सब इस बात पर बहस कर रहे हैं कि ये आरोप सही हैं या गलत, लेकिन एक बात भूल रहे हैं। इस सबका मूल आधार ये है कि हम एक ऐसे देश में रह रहे हैं जहां इंसान की जिंदगी को एक आंकड़े के रूप में देखा जाता है। जब तक हम इस दर्द को नहीं महसूस करेंगे, तब तक ये बदलाव नहीं आएगा।
Shashi Singh
ये सब एक बड़ी साजिश है!!! बीजेपी ने चुनाव आयोग को बेच दिया है!!! राहुल गांधी को चुनाव से बाहर करने के लिए इन बूथ अधिकारियों की मौतें तैयार की गई हैं!!! ये नहीं जानते कि इन लोगों को कौन मार रहा है!!! ये सब राष्ट्रीय सुरक्षा के खिलाफ है!!! इन फर्जी वोटरों के पीछे एक विदेशी एजेंसी है!!! ये आधार के साथ जुड़े हुए हैं!!! ये सब अमेरिका की साजिश है!!!
raja kumar
मैं एक छोटे शहर से हूं। हमारे यहां भी एक BLO गायब हो गया। उसकी बीवी ने कहा कि वो हर रोज घूमता था, अब नहीं। उसके बच्चे अब स्कूल में भी चुप हैं। ये बस एक आंकड़ा नहीं, ये हमारे समाज का टुकड़ा है।
Sumit Prakash Gupta
डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन का जो वादा है, वो वोटर लिस्ट के लिए भी आना चाहिए। ये नोटबंदी की तरह नहीं होना चाहिए। ये एक बड़ा इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट है। इसे एक नेशनल टेक प्रायोरिटी बनाओ।
Shikhar Narwal
ये जो बूथ अधिकारी हैं वो हमारे देश के असली हीरो हैं। बिना उनके कोई चुनाव नहीं हो सकता। उनके लिए एक डिजिटल सिस्टम बनाओ, उनके लिए एक डेटा ऐप, उनके लिए एक फोन जो ऑफलाइन भी काम करे। ये बस एक इंसानी बात है। ❤️
Ravish Sharma
राहुल गांधी ने जो कहा, वो सच है। लेकिन जब उनकी पार्टी अपने अंदर बिहार में सात नेताओं को निलंबित कर रही है, तो ये सब बस एक शोर है। बीजेपी चुप है, कांग्रेस चुप है। और हम बस एक बूथ अधिकारी की मौत को एक ट्रेंड बना रहे हैं।