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मुहर्रम: इस पवित्र महीने को समझें आसान भाषा में

अगर आपने कभी इस्लामी कैलेंडर देखा है, तो मुहर्रम सबसे पहला महीना है। यह न सिर्फ साल की शुरुआत दर्शाता है, बल्कि कई मुस्लिम समुदायों के लिए गहरी ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्ता रखता है। आज हम बात करेंगे कि मुहर्रम क्यों खास है, इसका इतिहास क्या है और भारत में लोग इसे कैसे मनाते हैं।

मुहर्रम का इतिहास और महत्व

मुहर्रम की शुरुआत इस्लाम के पैग़ंबर मोहम्मद (ﷺ) ने करी थी, जब उन्होंने हिज्रा (मक्का से मदीना) पर आधारित कैलेंडर अपनाया। पहली तारीख को ‘हजरी’ कहा जाता है और इसे नए साल का पहला दिन माना जाता है।

सबसे ज़्यादा याद रखी जाने वाली घटना 10 मुहर्रम की आशूरा है। इस दिन हज़रत अली (رضی اللہ عنہ) की शहादत हुई थी, जो पैग़ंबर के चचेरे भाई और प्रथम इमाम थे। उनका शहीद होना सिय्योनियों में ‘शहादत’ का प्रतीक बन गया और कई मुसलमानों ने इसे यादगार बनाया। इस दिन अक्सर दुआ‑इब्‍तक़ी, रोज़ा और माँगें रखने वाले लोग होते हैं।

ध्यान दें: सभी मुस्लिम समुदाय आशूरा को एक ही तरह नहीं मनाते। कुछ सुन्नी मुसलमान इस दिन रोज़े का रखवाला बनते हैं जबकि शिया मुसलमन अक्सर मौला अज़ाद, हुसैन और उनके साथियों की शहादत को याद करते हुए ताज्जिए (जाल) लेकर जुलूस निकालते हैं।

भारत में मुहर्रम के प्रमुख रिवाज़

भारत में मुहर्रम का माहौल बहुत रंगीन होता है, खासकर उत्तर‑पूर्वी राज्यों और बिहार‑उत्तर प्रदेश में। यहाँ की बड़ी विशेषता ‘जुलूस’ या ‘मोहल्ला परेड’ है। लोग हाथों में झंडे लेकर, शहीदों के नाम लेते हुए चलाते हैं। कुछ जगहों पर ताज्जिए को कूच (कुर्सी) पर रखकर घर‑घर जाकर दिखाया जाता है।

जोधपुर और लखनऊ जैसी जगहों में ‘झलक’ या ‘रंगवेश’ बहुत प्रसिद्ध है। लोग स्याही के साथ चेहरा रंगते हैं, ग़ज़लों को पढ़ते हैं और दावतें लगाते हैं। इस दौरान अक्सर सामुदायिक खाने‑पीने का भी आयोजन किया जाता है, जहाँ कबाब, बिरयानी और शाकाहारी व्यंजन मिलते‑जुलते हैं।

अगर आप दिल्ली या मुंबई में हों तो ‘ऐतिहासिक मस्जिदों’ के पास विशेष प्रार्थना सभाएँ देखेंगे। यहाँ लोग सुबह-शाम दोहराते हुए दुआ करते हैं, इमाम के खुत्बे सुनते हैं और अक्सर बच्चों को मुहर्रम की कहानी सुनाई जाती है ताकि वो भी समझें कि यह महीना क्यों इतना महत्वपूर्ण है।

एक बात ध्यान देने वाली है – इस महीने में कई लोग ‘सियामी’ (भेदभाव) से बचने के लिए एक-दूसरे का हाथ पकड़ते हैं, साथ‑साथ दान‑पुत्री भी करते हैं। यह सामाजिक सौहार्द को बढ़ाता है और मुहर्रम की सच्ची भावना को उजागर करता है।

मुहर्रम का महीना केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है; यह हमें सहनशीलता, एकजुटता और न्याय के मूल्यों की याद दिलाता है। चाहे आप मुसलमान हों या नहीं, इस महीने में होने वाले सामाजिक कार्यक्रमों को देख कर आप भी कुछ सीख सकते हैं – जैसे कि संघर्ष के समय धैर्य रखना और सही काम के लिये आवाज़ उठाना।

तो अगली बार जब मुहर्रम आए, तो बस एक नज़र डालिए उन जुलूसों पर, सुनिए लोगों की दुआओं को, और महसूस कीजिये इस पवित्र महीने का सच्चा सार।

मुहर्रम के उपलक्ष्य में आज शेयर बाजार बंद, एनएसई और बीएसई में नहीं होगी ट्रेडिंग
  • जुल॰ 18, 2024
  • के द्वारा प्रकाशित किया गया Divya B

मुहर्रम के उपलक्ष्य में आज शेयर बाजार बंद, एनएसई और बीएसई में नहीं होगी ट्रेडिंग

मुहर्रम के अवसर पर 17 जुलाई, 2024 को बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) समेत सभी घरेलू इक्विटी बाजार बंद रहेंगे। यह बंद सभी सेगमेंट्स जैसे इक्विटीज, डेरिवेटिव्स, सिक्योरिटीज लेंडिंग एंड बॉरोइंग, और करेंसी डेरिवेटिव्स को प्रभावित करेगा। ट्रेडिंग 18 जुलाई को सुबह 9:15 बजे फिर से शुरू होगी।

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