अगर आप कभी रात को सितारों की तरफ देखते हैं तो सोचिए कि एक बड़ा लैब धरती के पास ही घूम रहा है। वही लाब है अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन, या ISS. यह 400 किलोमीटर ऊँचाई पर पृथ्वी का चारों ओर चक्कर लगाता है और कई देशों ने मिलकर इसे बनाया है। रोज़ाना लगभग 16 बार धरती को देखता है, इसलिए हमें हर दिन कई बार उसके ऊपर से गुजरते हुए दिखता है।
ISS का वजन करीब 420 टन है और इसमें वैज्ञानिक प्रयोग करने के लिये लैब मॉड्यूल, रहने वाले डॉम, सोलर पैनल आदि शामिल हैं। सॉलर पैनलों से मिलती बिजली इसे चलाती रहती है, इसलिए कोई ईंधन नहीं चाहिए. स्टेशन पर माइक्रोग्रैविटी यानी कम गुरुत्वाकर्षण के कारण कई तरह के प्रयोग होते हैं – जैसे दवा बनाना, पौधों की वृद्धि देखना और मानव शरीर पर अंतरिक्ष का असर समझना। इन प्रयोगों से हमें धरती पर भी नई तकनीक मिलती है.
एक खास बात यह है कि ISS में लगातार 6 महीने में दो बार नए क्रू आते-जाते रहते हैं. नासे, रॉसकोसम और ESA जैसे एजेंसियों के वैज्ञानिक यहाँ रहकर काम करते हैं। उनका जीवन आसान नहीं – छोटे कमरे, सीमित पानी और भोजन, लेकिन वे रोज़ नई चीजें सीखते हैं और हमारे भविष्य को आकार देते हैं.
भारत ने भी ISS में अपना हिस्सा दिया है. 2017 में ISRO के ‘गैगन्यत’ प्रयोग से भारतीय वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष में पौधों की वृद्धि देखी थी. इसके अलावा, भारत के कई छोटे सैटेलाइट्स और प्रायोगिक मॉड्यूल भविष्य में ISS या उससे जुड़ी नई मिशनों में उपयोग हो सकते हैं.
आगे चलकर ISRO चंद्रमा और मार्स पर भी ऐसे प्रयोग करने की योजना बना रहा है जहाँ से मिले डेटा को ISS पर भेजा जा सके. इससे न केवल अंतरिक्ष विज्ञान बल्कि खेती, दवा और ऊर्जा के क्षेत्र में बड़ी प्रगति होगी.
ISS का जीवन 2030 तक जारी रहने वाला माना गया है, लेकिन इसके बाद नई स्पेस स्टेशनों की योजना बनाई जा रही है. भारत भी अपनी खुद की कक्षा स्टेशन बनाने की दिशा में काम कर रहा है – ‘गुरुशक्ति’ नामक प्रोजेक्ट के तहत हम जल्द ही अपने मॉड्यूल को अंतरिक्ष में भेज सकते हैं.
समझें तो ISS सिर्फ एक प्रयोगशाला नहीं, बल्कि देशों के बीच सहयोग का प्रतीक भी है. जब भारत और अन्य देश मिलकर काम करते हैं, तो विज्ञान की सीमाएँ दूर होती जाती हैं. अगर आप इस बारे में और पढ़ना चाहते हैं तो हमारे साइट पर रोज़ अपडेटेड लेख देखें.
आखिर में, अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन हमें याद दिलाता है कि हमारी छोटी-छोटी समस्याओं से बड़े लक्ष्य तक पहुंचा जा सकता है – बस चाहें और मिलकर काम करें. इस लाब की खबरें, नई खोजें और भारत का योगदान यहाँ ही पाते रहें.
नासा की अंतरिक्ष यात्री सुनिता विलियम्स और उनके साथी बट्च विलमोर को अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर पांच महीने से फंसे हुए देखते हुए ताजे भोजन की कमी की चिंता बढ़ रही है। जबकि उनके पास पर्याप्त भोजन है, ताजे फल और सब्जियों की कमी उनकी सेहत पर असर डालने की संभावना है। अंतरिक्ष में वजन कम होने और अन्य शारीरिक बदलावों की समस्याओं पर भी ध्यान दिया जा रहा है।
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